Tuesday, 1 October 2013

कैसा बदलता भारत? क्या यही है बदलता भारत?


कुछ दिनों से मन में यही सवाल उठ रहें हैं कि क्या यही वो भारत है जिसकी कल्पना हमने की थी, हमारा भारत आजाद और सुरक्षित होगा। क्या यही वह इक्कीसवी सदी है, जिसे नारी सदी कहा जाता है। हाल ही में आये कुछ वाकयो से तो ऐसा नही लगता कि औरते अब कहीं भी सुरक्षित है। अभी तक तो बात शहरों को लेकर दिल्ली और मुम्बई सुरक्षित है या नही या किस हद तक अब तो संत और आश्रमों पर भी सवाल उठ रहें है। तो क्या कहेंगे? दिल्ली के दामिनी और मुम्बई के फोटोग्राफर के मामले को लेकर देश उभरा ही नही था कि अब संत आसाराम बापू नही शायद संत या बापू लगाना उस लड़की का अपमान करने जैसा होगा। आसाराम का यह मामला सामने आ गया है मतलब यह की अब तक लोग घर-द्वार मोह माया से परे होकर किसी आश्रम में जीवन-यापन करना पसंद करते थे, पर अब शायद किसी आश्रम में पनाह लेने के पहले उन्हें सोचना होगा। कहीं उनका विश्वास अंधविश्वास में तो नही तब्दील हो रहा है। कहीं उनके विश्वास के साथ कोई खेल तो नही हो रहा। अब शायद सभी नागरिको को सोचना होगा, किसी संत या आश्रम पर विश्वास कर रहें हैं। उनका यह विश्वास उन्हें सच में तो अंधा नही बना रहा।
जुवेनाइल नाबालिग जुर्म को बढ़ावा तो नही?
दिल्ली रेप केस की पीडि़ता दामिनी ने मौत से लड़ते-लड़ते 16 दिसम्बर को दम तोड़ दिया। पर उसकी ये हालत बनाने वाले दोषियों की सजा के फैसले से खुशी तो बहुत हुयी साथ ही उस वकील पर बहुत गुस्सा भी आया जिसने ऐसा स्टेटमेन्ट दिया। फासी की सजा तो सभी अपराधियों को सुनायी गयी पर नाबालिग को जुवेनाइल की सजा सुनाई गयी। वहीं मुम्बई की फोटोजर्ननिस्ट से दुष्कर्म के सभी आरोपी और बैंगलोर की लाॅ स्टूडेन्ट के दुष्कर्म मामले में एक आरोपी नाबालिग होने के कारण जुवेनाइल की सजा मिलेगी, सिर्फ तीन साल जेल नही सुधारएक्ट कहा जाता है। जहां उन्हें उनके घर से भी ज्यादा सुविधाएं और खाना पीना मुहैया कराया जाता है। क्या उनके इस घिनौने अपराध के लिये सजा वाजिब है। क्या इस घिनौने कृत्य को करते वक्त वो ये भूल गये कि वो नाबालिग है या उन्हें मालूम था कि इस कृत्य की सजा उन्हें ज्यादा नही मिलेगी इसलिये उनकी हिम्मत बढ़ गई? क्या अपराधी के नाबालिग होने से दामिनी और अन्य पीडि़तों का दर्द तकलीफ कम हो गयी? क्या समाज में वो फिर से अपनी वही जिंदगी जी पायेगी। उन्हें वही आत्मविश्वास और इज़्ज़्ात मिल पायेगी। क्या उनके भविष्य से यह दाग कम हो जायेगा। क्या इससे उनका भविष्य ,आज़ादी, खुशी, आत्मविश्वास जो छीना है वह वापस मिलेगा? क्या कुछ प्रतिशत इनकी ये सारी तकलीफें भी कम हो जायेंगी? शायद नही, और शायद नही-इसका जवाब तो सिर्फ नही ही है तो फिर उन अपराधियों को जुवेनाइल की सजा क्यो? क्या आपको नही लगता की उनके लिये भी कोई कठोर सज़ा मिलनी चाहिये जो उन्हें इस घिनौने कृत्य की तकलीफ का अंदाज़ दिला सके कि उन्होंने सिर्फ अपनी हवस के लिये क्या किया है?
जुवेनाइल का कानून सिर्फ हमारे देश में ही सभी जुर्म के लिये एक समाज ही बल्कि बाकी देशों में जुवेनाइल का निर्धारण इस बात से होता है कि उसका अपराध क्या है? उसके अनुसार ही सजा का निर्धारण भी होता है और हमारे देश को भी अब ऐसे ही कानून की आवश्यकता है ताकि जिस जुर्म को अंजाम देने वाले को दंड का खौफ सताये वरना दंड के अभाव में कहीं अपराधियों की संख्या ना बढ़ जाये।
दामिनी रेप केस के बाद आसाराम का जो बयान या शायद हमें उसी वक्त अंदाजा लगा लेना चाहिये कि आसाराम भी कुछ दिन बाद शायद इसी चोले में दिखने वाले हैं।
उस वक़्त उनके इस बयान ने उस लड़की को दुष्कर्म के वक़्त उन आरोपियों को भाई कह देना चाहिये इससे ये हादसा नही होता, और वह लड़की को छोड़ देते और यह घिनौना कृत्य होता ही नही। उस वक़्त भी उनके इस बयान ने सारे देश में हलचल मचा दी थी कि इतने संगीन हादसे पर इतने बड़े व्यक्ति का यह किस तरह का बेतुका बयान है और जब खुद इस घिनौने कृत्य के आरोपो में घिरे तो उनका यही कथन था कि लड़की मेरी पोती जैसी है, मैं उसके साथ ऐसा कैसे कर सकता हंू। पता नही कि वह बालिका क्यों ऐसे आरोप मुझ पर लगा रही है। आसाराम के विश्वास इतने बड़े जुर्म को करने के बाद भी तो कितने विश्वास के साथ अपने आप को निर्दोष बता रहे थे और अब जब उनके सारे जुर्म साबित हो ही चुके है तो शायद उनके पास देने के लिये और बेतुके बयान नही है और अब तो वो कुछ ना ही कहे तो उनके लिये बेहतर होगा  क्योकि अब तक देश भर से उनके समर्थक उनके साथ थे पर अब तो शायद सच जानकर उनके काफी समर्थक अब उनके समर्थक नही रहेंगें।
तो बापू जी अब ज़रा सोच समझकर अपने सदवाक्य कहीयेगा, कहीं वो आप पर भारी न पड़ जाये।

Wednesday, 9 May 2012


हम चाहकर भी,हमसे दिख नही पाते,
जीते तो है मगर, खुद सा जी नही पाते।
 क्या दिखना है, वही दिखाते है
और क्या है हम, ये खुद के अंदर छुपा लेते हैं।
खुल के जीने की चाह भी है अरमान भी है,
और इस दुनिया से परे, खुद का गुमान भी हैं।
पर इस दुनिया के लिए, खुद को खोते जा रहे है,
दुनिया के धागे मे ,खुद को मोतियांे सा पिरोते जा रहे है।
जी तो चाहता है,इसे धागें से आजाद होने को ,
उपने में सिमट कर, खुद में जीने केा।
ना जाने कब इस बंधन को, मै तोड़ पाऊंगी।
दुनिया केl भूल कर, खुद में आजाद रहकर जी पाऊंगी?

Monday, 26 March 2012

खुशियां



खुशियां आती है, हलचल मचाती है,
दो पल पास रहकर, दूर चली जाती है।
मैं चाहती हू हर पल उसका साथ,
पर हमेशा मुझे वो कर जाती है उदास।
 जब तक रहती है ये मेरे साथ , दे जाती मुझे कुछ नया सा अहसास,
होंठो की पंखुडि़या खुल जाती, और की चमक लौट आती है।
चेहरे की रंगत कुछ अलग ही नजर आती है,
और दिल में उमंगो की बरसात सी हो जाती है।
पर क्यूं मुझ संग ये आॅख मिचैली सी खेल रही है,

कुछ पल सामने रहकर जाने कहां छिप रही है।
ढूंढती फिरती हू इन्हे में , हर कदम हर राह पे ,
कुछ पल के लिए मिलती ,एक अनजानी पनाह में।
जाने क्यूं मुझसे ये रूठी है,
अपनी जिद मेंु ऐसे ऐठी है।
बहुत हो गयी तेरी जिद और तेरी दूरी,
आ जा पास ,तू समझ ले मेरी भी मजबूरी ।
ले मै हारी और हो गई तेरी जीत,
अब लौट भी ऐ खुशी बनकर मेंरी मीत।


Thursday, 8 March 2012

काश ये जिंदगी फूलो सी बन जाती,



काश ये जिंदगी फूलो सी बन जाती,
दूसरों को खुश्बू देकर खुद महक जाती।
अपने लिए ना कोई चाह ,ना कोई अरमान,
             दूसरों के नित होने में ही है, उसका  स्वाभिमान,                     
 
 
काश हम भी एक फूल की तरह जाी पाते।
निज का स्वार्थ तज, दूसरों के हित कर पाते,
काटो के बीच रहकर भी ,मखमल सा बन पाते।
इन फूलों की क्या जिंदगानी होती है,
उनके हर एक जर्रे की उनसे ,बेगानी होती है।
तितलियों के लिए रंग, भौरो के लिए खुश्बू ,
अर्थी हो या भगवान की मूरत, दोनों के नित है एक ही सूरत।

किसी भी बात पर गुमान ना अफसोस उसे ,
ना ही किसी से खुशी और ना किसी से रोष उसे।  
                         
 
                                                   काश हम भी इस फूल की तरह, निष्छल रह पाते
सभी परिस्थितियों में उनसा ,सम रह पातें।


Thursday, 2 February 2012

तेरी याद

आज तेरी याद आ रही है,
तेरी अधूरी बात तड़पा रही हैं।
एक बार तो तूने दिल की बात कही होती,
तो आज तेरी कमी यू ना हुई होती।
क्या वजह हो गयी तेरे इतने दूर जाने कीं,
इतने दूर की कभी लौट के ना आने की।
तेरी बात न सुन पाने की मुझसे भूल हुई,
क्या यही थी वजह जो तू  मुझसे दूर हुई।
त ू तन्हा करके मुझे चली गई,
कितने सवाल मेरे मन मे छोड गई।
इन सवालो के जवाब मैं कहाॅ से पाऊ।
अब तुझे फिर से पाने के लिए अब मै क्या कर जाऊॅ,
अब तुझे फिर से पाने के लिए अब मंै क्या कर जाऊॅ।
आज दिल तुझे आवाज लगा रहा है,
तेरे दूर होने पर भी तुझे करीब पा रहा है।
तू इतनी दूर चली गई है,
ये ना मान पा रहा है।
दिल कहता है तू कही है  लौटकर जरूर आयेगी,
मेरे सारे सवालों के जवाब दे जायेगी।

Tuesday, 31 January 2012

जिदंगी के सफर में चले जा रहे है,

जिदंगी के सफर  में चले जा रहे है,
रास्ते में ना जाने कितने मुका आ रहे है,
कुछ जाने कुछ अनजान से मुकाम है,
और सफर की मंजिल से हम अब तक अनजान हैंे।
 कितने मोड आये,कितनी राहे बदल गयी,
 कितनी मंजिल आयी और आकर निकल गयी।
हम अब तक बस,सफर तय किये जा रहे हैं,
पर मंजिल का निशा अब भी हम कहा पा रहे है?
राहों पे चलते हुऐ मंजिले बदलती गयी,
हर राह पे एक नयी मंजिल बनती गयी।
                                                      तमन्ना

Saturday, 26 November 2011

but moon is alone in the sky


the sky is blue ,
and moon alonein the sky ,
stars are moving around it
but moon is alone in the sky….
 stars are twinkling ,
and close and open their eyes,
sky looks like blue sea ,
but  moon is alone in the sky…
the stars want to play with moon ,
they are try to make laugh to moon,
and they want that moon be happy ,
but moon feel alone in the sky….
stars look like lighten candle ,
and the sky look llike a temple,
but moon find the god and
moon is not happy…
 sky is looking like silent sea side ,
it give peace to people,
the child is happy to see the moon,
now moon is also happy ,
 bcoz of child smile,
now moon got the god ,
in the face of child…………



Wednesday, 23 November 2011

फूलों सी जिदंगी






काश ये जिदंगी सी फूलों सी बन पाती,
दूसरों को खुश्बू देकर महक पाती।
अपने लिए ना कोई चाह,ना कोई अरमान ,
दूसरों के नित होता है,उसका स्वाभिमान।
काश हम भी एक फूल की तरह जी पाते,
निज का स्वार्थ तज,दूसरों का हित कर पाते।
इन फूलों की क्या भी क्या जिंदगानी होती है,
हर एक जर्रा भी उनका उनसे बेगानी होती है।
तितलियों के लिए रंग ,भौरों को रस,
अर्थी हो या भगवान की मूरत ,दोनों के लिए है उसकी एक  ही सूरत
 किसी भी बात पर  ना गुमान ना अभिमान,
ना ही कोई खुशी ना ही रोष है
सब कुछ सह कर भी रहता खामोश।
काश हम ही इन फूलों की तरह रह पाते,
हर जगह बस अपने प्यार की खुश्बू बिखेरते जाते।

Wednesday, 12 October 2011


आज की रात बड़ी रूसवाई की है,
दो इश्के बफा की जुदाई की है।
 ये रात इस जॅहा से नजर चुरा रही है ,
दो इश्क के बांशिदोे पर कहर ढा रही है,
हर बीते लम्हे की यादे जहन में बस गई है।
मानो उन यादों से दिल की दुनिया झुलस रही हो।
कैसे भूल पाऐंगें वो लम्हे जो गुजारे साथ में ,
वादे किये जो उनसे ,हाथो को रख हाथ में ।
अब तो हर बात ,हर सांस में उनकी खुश्बू समाई है,
हर गुजरते लम्हे ने उसी की आश लगाई है।
दर्दे हिजरा लिये दिल यही पूछ रहा है,
ऐ खुदा बता ये तेरी कैसी खुदाई है।
इस दिल ने भी ना जाने,कैसी हसरत की है,
कैसे भूलेंगें उन्हे ,जिसकी इस दिल ने इबादत की है।
 बनकर बुत उनकी यादों को दफन कर लूंगी ,
सामा(सामान)समझ खुद को ,अजनबी के समन कर लूंगी।
ऐ खुदा मुझ पर तू इतनी रहम कर दे,
वो भूल जाए इस नाचीज को,इतना करम कर दें।
ये रात जिंदगी का,ऐसा फसाना बनेगी,
जिसे चाह कर भी जुबा दोहरा ना सकेगी ।
ना करना इस जिंदगी मे रूबरू उनसे ,खुदा,
ये नजर  उस नजर का तारूख ना कर सकेगी।

आज माँ को मैने जाना है जाना है






 
माँ तेरी कमी आज मुझे रूला रही है ,
दिल की गहराई से तुझे बुला रही है।
आज याद आ रहा है तेरा मुझे सहलाना
वो मेरी उदासी में मुझको बहलाना।
                                     हर एक पल मुझे ,तेरी याद दिला रहा है,
                                    और तेरे क्या है जीना ,मुझको अहसास करा रहा है।
                                    रोज शाम को मैस की रोटी ,जब थाली में आती है ,
                                     तब तेरे हाथो की बाटी,तेरी याद दिलाती है ।
घर पर तो खाना खाने में ,मै नखरे खूब बताती थी
और थोड़ा भी ठंड़ा खाना हो ,तो लाख बहाने गाती थी ।
तेरी छुई मुई सी बेटी ,अब पत्थर बन गई है मॉ,
और घर में कुछ ना करने वाली,अब सब कुछ कर रही है मॉ।
                                      घर में जब तू संग रहती थी ,तुझसे हर काम को कहती थी,
लड़ती थी झगड़ती थी और मन मर्जी से सब करती थी ।
जब परिक्षाऐं मेरी आती थी ,मै पढ़ते पढ़ते सो जाती थी ,
 

और रात को फिर हौले से तुम ,मेरी पुस्तक बंद कर जाती थी ।
अब भी पढ़ते पढते मै माँॅ
पुस्तक खोल के सोती हू,
जब नींद खुली मेरी तो फिर मैं, खुद ही पुस्तक बंद कर लेती हूॅ।              
जब तक तेरे साथ थी मै माँ ,तुझको जान पाई थी,
और तू कितनी प्यारी है माँ ,इसको पहचान ना पाई थी,
तुझसे दूर रहकर के मॉ ,तेरे साथ को जाना है,
और तेरे साये का सुख क्या है? अब मैने पहचाना है।



Tuesday, 27 September 2011

बारिश की बूंदे



बारिश की बूंदे कितनी प्यारी होती है,
जैसे किसी बगिया में बयारे होती है ।
हर किसी की अपनी अलग कहानी होती है,
किसी के लिए खुशियों का अहसास ,तो  किसी के लिए यादों के पैमाने होते है।
 
किसी बच्चे की मासूम ख्वाहिश होती है ,
तो जवा दिलों कि ये हसरत होती है ।
किसी बूढ़े के बीते दिनों कि याद होती है
और हर किसी के लिए इसकी अपनी कायनात होती है।
वैसे तो बारिश की बूंदे धरती पे नीर गिराती है ,
पर कही कही ये बूंदे मन में एक मीठा सा पीर दे जाती है।
धरती गीली,,मिट्टी सौंधी,पेडों में रस भर जाती है
बड़ा सुहाना लगता है ,जब बगिया प्यारी खिल जाती है।
कुछ भी मानो कुछ भी जानो ये बारिश बड़ी निराली है ,
पल मे शोला,पल मे शबनम, दिल को करने वाली है ।
ठहरे हुए मन में भी हलचल मचा देती है ,
कुछ भी कह दो पर ये बारिश तो बड़ा सुकू देती है।
 

Tuesday, 20 September 2011

जिंदगी से आज मेरी,मुलाकात हो गई ,



जिंदगी से आज मेरी,मुलाकात हो गई ,
कुछ देर बाते राहो में ,उसके साथ हो गई।
कुछ अटपटी, तो कुछ सीधी सी बात हुई ,
कुछ हैरानी, तो कुछ मुस्कुराहटे लाती हुई ।
कभी ये पहेली ,कभी सुलझी सी चकोर लगती है,
कभी जैसे पतंग में, उलझी हुई ड़ोर लगती है। 

कभी धूप कभी छाव ,हर रंग अपने दिखा दिये 
कभी पल में खुशिया तो कभी,दुनिया के सारे रंग दिखा दिये ।        
किसी से कुछ ना चाहो, इसी में सबसें बडी खुशी है ,
दूसरो को हसीं देना ही ,यही जिंदगी है
हर पल को अनमोल बनाने का ,फलसफा सिखा गई ,

एक छोटी सी मुलाकात में जीने का सलिका बता गई।
 


Sunday, 18 September 2011

जाने क्यों ,आज दिन गुम सा है,

जाने क्यों ,आज दिन गुम सा है,
जुबा से कहकर भी ,अंदर गुमसुम सा है।
सब कुछ जानकर भी, बन रहा अनजान है,
जाने क्यों ये दिल, इतना नादान है ।
आज दिल की उलझन ,क्यों बढ़ रही है,
माथे की भौ जाने, क्यों चढ़ रही है ं
बिन बात के ये ,जाने क्यों रूठा बैठा है,
मनाकर हार गए ,पर यू ही ऐठा बैठा है।
एक याद है या यादों का जहान,
सब है मगर ,फिर कुछ पाने का अरमान है।
 भरी महफिल में भी, तनहा कर रहा है,
जने किस बात पे ये ,इतना ड़र रहा है।
किसी की यादों को ,दिल से जोड़ रहा है
वो पास है फिर भी ,उसे पाने को दौड़ रहा है।
जाने क्यों आज से ज्यादा ,बीते पल की याद को संजो रखा है ,
समझ नही आता,
इन बीते पल की ,यादों में क्या रखा है।
लाख पूछने पर भी ,करता यही बयान हैं
कि बस ये समझ लो ,इन यादों से मेरी पहचान है।
जाने क्यों ये दिल ,इन यादों के मरहूम हो गया है,
इन यादोें से ही शायद ये दिल आज गुमसुम हो गया है।

Wednesday, 14 September 2011

चाँद की हसरत


उस चाँद को देखकर भी ,ये ऐहसास होता है ,
कि वो हमसे दूर रहकर भी ,
हमारे पास हमारे पास होता है।
खुद तो   चाँदनी के बिन ,कितना उदास होता है ,
पर दो दिलो को मिलाने की, लिये आस होता है ।
दर्द जानता है ,वो जुदाई का
  क्या होता है, आलम तन्हाई का ।
                         चाँदनी से मिलने की, जब प्यास होती है,
   पर उस मिलन पर भी, कयास होती है।
कैसे गुजरती है ,वो तन्हाई की रातें ,
जब चाँदनी से उसकी ,नही होती है बातें ।
उस चाँदनी की भी, ये बेवसी होती है
और  चाँद की चाह में ही, सारी जिंदगी होती है।

   चाँद की चाहत में ,ना बेवफाई  है,
  हर किसी की चाहत की ,यही रूसवाई है।
जब इस चाहत की, दूरियाँ सिमटी है ,
तब इस जहॉ से तिमिर की ,छाया मिटी है ।
चाहत से हमेशा ,जहॉ मे रोशनी हुई है,
सच्ची चाहत की हर मोड़ पर ,आजमाइस हुई है।
इसलिए चाँद आज भी, चाँदनी के लिए रोता है ,
और बिन चाँदनी के वो, हमेशा अधूरा होता है।

Thursday, 8 September 2011

वक्त

वक्त,सुनकर ही दिल थम सा जाता है,   
ना जाने अगला लम्हा कहॉ को जाता है।
                      हर कोई इस वक्त के पीछे भागता है,
वक्त पे सोता और वक्त पे जागता है।
हर कदम कदम में इस वक्त की ऐतियात है,
क्योंकि कहते है किस्मत बदलना ,वक्त वक्त की बात है।
क्या कभी ये वक्त किसी के आगे झुका है,
और ,कम्बख्त वक्त कहॉ किसी के लिए रूका है।
जो वक्त रहते, इस वक्त का हमदम हो गया ,
समझो कामयाब वो, हरकदम हो गया।
                       और जिसने  भी इस वक्त की कद्र ना किया है ,
                        इस वक्त ने भी उसको बेकद्र किया है।
किसी का साथ मिलना ,और बिछड़ना भी वक्त की बात है ,
 क्योंकि वक्त ही बनाता, हमारे सारे हालात है।
                       इंसा बदले,हालात बदले,जमाना बदल गया,
                       वक्त तो वक्त है ,हर मोड़ पे एक रफ्तार से चलता है।
इस वक्त की ना कोई महजब , ना कोई जात है,
इसका ना कोई अरमा ,ना कोई जज्बात है ।
                       वक्त रहते जिसने, इस वक्त को सही जाना है,
                       वक्त ने भी वक्त पर ,दिया उसे हर खजाना है।
इस
वक्त को ना किसी ने देखा ना कोई खोज सका है,
इस वक्त को इंसा तो क्या, खुदा भी ना रोक सका हैै।
                      जिस वक्त जो चाहा वो मिल जाए, वो वक्त की ही बात है,
                             वक्त के आगे तो ,बेबस सारी कायनात है।
वक्त के पहले ,इंसा कुछ ना पाता है ,
क्योंकि इस वक्त को तो ,खुदा खुद ही बनाता है।



Wednesday, 7 September 2011

ख्वाहिश


इंसान की फितरत में कितनी हसरत होती है,
कि हर ख्वाहिश ,उसकी जरूरत होती है ।
                           जो चाह लिया ,उसे हासिल कर जाना है ,
                            उसके लिए ही फिर ,रब को भी मनाना हैं।
मानो उस ख्वाहिश से बढ़कर कोई चाहत ना होगी,
उससे ज्यादा किसी की भी इबादत ना होगी।

पर उस ख्वाहिश के मिलने पर अंजाम यही होता है,
शुरू में जैसे,सारी जिंदगी का अरमान यही होता है।
,पर कुछ दिन मे ये ख्वाहिश,फरमाइश सी लगने लगती है,
कुछ दिनों के लिए पूरी हुई नुमाइश सी लगने लगती है।

ख्वाहिशे पूरा होने पर जब, उसकी अहमियत नही रखते,
फिर क्यों इंसा ऐसी ख्वाहिशे ही रखते है।
ख्वाहिशे वो नही जो पूरा होने पर कभी किसी मोड़ पर बदल जाए,
  ख्वाहिशे तो वो है जिसके पूरा होने पर जिदंगी बदल जाए।

Tuesday, 6 September 2011

सादगी कहॉ खोती जा रही हैं ,
जिंदगी क्या होती जा रही है ।
ना चैन है ,ना अमन है ,
हर जगह हो रहा द्वन्द है ,
यहॉ तो खुद से हो रही जंग है,
हर एक चरित्र अपने आप में भंग है।
हर किसी की दृष्टी  में दोष है ,
जाने किस बात पे, सभी में रोष है।
क्यों बदलें की भावना ,हर दिल में पल रही हैं,
क्या सादगी से जिंदगी नही चल रही हैैं?
बाहरी सुंदरता के पीछे सब क्यों भागते हैं,
अंदर  की सुंदरता को क्यों नही भापते हैं।
 जरा अपने अंदर भी तो नजर ड़ालो,
बाहरी दुनिया के भ्रम को इतना ना पालो ।
क्षमा को अपना गहना बना लो ,
दूसरो की गलतियों कों ,अपनी सीख बना लो ।
दृष्टी को अपनी व्यापक बना लो ,
दूसरों में गलतियां ढूंढ़ते ,खुद को ना भुला लो।
हर मोंड़ पर एक पत्थर मिलेगा,
ना मान बैठो उसे राह का रोड़ा ,
उसी पत्थर से अपनी राह बना लो।
ये जिंदगी मिली है बड़े कर्म से ,
जी लो इसे भावों के मर्म सें।
ना करों जिंदगी को ,बैर में र्व्यथ।,
प्रेम बाटना ही है ,जिंदगी का सही अर्थ
इसी अर्थ कों अपने जीवन का आधार मानों।
ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा,
और सभी जन को ,इसका हकदार मानो।

Monday, 5 September 2011

formy friend divya poem

एक प्यारी सी लाली थी,
थोड़ी सी नखराली थी।
हसतीं थी हसातीं थी,
घर में धूम मचाती थी।
भैया की प्यारी बहना थी,
दीदी की प्यारी मैना थी।
मम्मी की प्यारी गुड़िया थी ,
पापा की प्यारी चिड़िया थी।
घर मे वो चह चह कर करती थी ,
और कभी ना वो चुप रहती थी ।
घर में उससें खुशहाली थी ,
घर की वो राजदुलारी थी।
खुद तो वो खूब खाती थी ,
पर औरो को खूब पकाती थी।
   रेड़ियों सिटी की दीवानी थी,
   फहत की चाहने वाली थी।
जॉकी बनने की ख्वाहिश थी,
तो करनी उसे पढ़ाई थी ,
इसलिए घर से हुई पराई थी।
मम्मी से दूर वो आई थी ,
मम्मी से दूरी पहली थी
पर  दूरी उसने सह ली थी ,
कुछ दिन शुरू में रोई थी,
मम्मी की यादों में खोई थी।
रात को थोड़ा डरती थी ,
सखियों संग सांेया करती थी,
गुड़मार्निंग फ्रैन्ड्स कह जगाती थी ,
और सबके साथ ही खाती थी
सबसे वो मिल जाया करती थी।
रंगों सी घुल जाया करती थी,
अब सबसे मिल गयी थी वो,
इस माहौल में ढ़ल गयी थी वो,
शक्कर सी घुल गयी थी वो,
अब मां के बिन रह लेती थी
अब तन्हा ही सो लेती थी।
अब चुप्पी उसकी भाग गई ,
और मनु की नई शुरूआत हुई,
सारी डॉरमी चहक गई,
रेड़ियों की धुन फैल गई ,
सबकी नकल बताती थी,
सबकों खूब हसातीं थी।
हर बात पे डायलॉग करती थी ,
फिल्मों की धुन में ही रहती थी ।
सबको उसको खूब चिढातें थें
-----कहके बुलाते थे ।
उसके नाम से चिढती थी।
सबकों चुप रहने को कहती थी।
डाइटिंग तो वो करती थी,
पर खूब मलाई खाती थी।
जैसी भी थी बडी प्यारी थी ,
सारी दुनिया से न्यारी थी।
ऐसी उसकी कहानी थी ,
बिन राजा के वो रानी थी ।
 

Friday, 2 September 2011

आज याद आ गया, वो अफसाना ,
वो बीते हुए दिनों का, प्यार भरा फसाना।
      स्कूल के दिनों का वो गुजरा जमाना,
      गुनगुनाते फिरते थे जो ,वो प्यारा तराना ।
सावन के महीने का वो, मौसम सुहाना ,
एक छतरी लेकर ,वो स्कूल को जाना।
   शुरू होता है इसी वक्त वो, टूयूशन का दौर ,
  पूछो ना यारो ,वो वक्त था कुछ और।
स्कूल में जाते ही ,सीटे हथियाना ,
प्रेयर में जाकर ,हल्ला करवाना।
   क्लास मे आ करके, शोर मचाना
   टीचर के आते ही ,सीधे बन जाना।
फस्ट क्लास से ही, लंच बॉक्स निकालना,
लंच टाइम आने के पहले खा जाना ।
 
       टूयूशन मे जी भर के मौज मनाना,
       टीचर के आने पर उनको सताना ।
घंटेभर पढकर फिर बाते बताना ,
लड़को को पार्टी के लिए ,बहाने बताना,
         उनसे ही टूयूशन में समोसे मंगाना ,
         उनकी कॉपी मे कार्टूनस बनाना,,
स्कूल में फै्रंडृस से गप्पे लडा़ना,
लासट प्रियड़ आते ही ,शुरू करना गाना बजाना।
                                 किसी को भी किसी का नाम लेकर चिढाना ,
                                   वो रूढ़ जाए फिर उसको मनाना।
यही तो होता है स्कूल टाइम का फन ,
स्कूल लाइफ ही तो होती है,यारो टन टनाटन टन।